बकरी पालन

गोट फार्मिंग प्रोजेक्ट के लिए सर्वप्रथम 10/10 अर्थात 100स्क्वायर फिट जगह की आवश्यकता होती है,जिसे बकरी बाड़ा कहा जाता है।नए ब्यवसाई के लिए सुरुवात मैं ग्राम पंचायत की आम सभा में प्रस्ताव रेजिस्टर में बकरी बाड़ा का आवेदन अंकित करवायें,ब्लाक स्तर पर 35000 की धनराशि आपको मनरेगा के अंतर्गत आवंटित की जाती है, सुरुवात में अच्छी नस्ल के 5 बकरियां और 1 बकरे से ही रोजगार की सुरुवात करें।ध्यान रहे कि बकरी की नस्ल 2 बच्चे देने वाली होनी चाहिए।मात्र 6 माह पश्चात आपकी 6 की जगह 16 हो जाएंगी।स्वछता हेतु फर्श की ढाल एक कोने की तरफ होनी चाहिए तथा बकरियों के बैठने के लिए 2 फिट ऊंचा रेम्प लकड़ी के तख्तों द्वारा स्थापित करें,जय उत्तराखंड

दूध उत्पादन

हमारे देश की अर्थव्यवस्था कृषि क्षेत्र (एग्रीकल्चर सेक्टर) पर काफी निर्भर करती है. ऐसे में इस क्षेत्र में काम करने वाले प्रोफेशनल लोगों की डिमांड भी काफी अधिक रहती है. कृषि क्षेत्र को लोग अक्सर खेती से जोड़कर देखते हैं और मानते हैं कि खेती करना और किसान बनना इस सेक्टर में आगे बढ़ने का एकमात्र विकल्प है. लेकिन ऐसा सोचना गलत है, क्योंकि आज कृषि सेक्टर में सिर्फ खेती ही नहीं बल्कि आपके पास करियर बनाने के कई अन्य ऑप्शन मौजूद हैं. इसमें से एक विकल्प है डेरी फार्मिंग है.

एग्रीकल्चर सेक्टर में डेरी फार्मिंग का काफी चलन है और इसकी वजह है दूध और उससे बनने वाले अन्य प्रोडक्ट्स की बढ़ती डिमांड. बहुत से लोग आज इस सेक्टर की ओर रुख कर रहे हैं. मिल्क (दूध) प्रोडक्शन का काम फायदे का सौदा माना जाता है और इसकी मदद से आप कई मिल्क प्रोडक्ट्स भी बना सकते हैं. साथ ही दूध से बनने वाले प्रोडक्ट्स की आप पैकेजिंग कर उन्हें मार्केट में या फिर अपनी डेरी में डिस्ट्रीब्यूट भी कर सकते हैं. लेकिन कोई भी काम बिना सोचे समझे नहीं करना चाहिए. इसलिए खुद का डेरी फार्म खोलने से पहले इन बातों का ध्यान रखना न भूलें.

नस्ल का रखें ध्यान

कोई भी डेरी फार्म बिना दूध देने वाले जानवरों के नहीं चल सकता है. ऐसे में डेरी फार्मिंग का बिजनेस डालने से पहले जानवरों की नस्ल  के बारे में भी रिसर्च कर लें. अपनी डेरी में गाय की नस्ल को लाये जो पहाड़ी क्षेत्र के मौसम के अनुसार ढल सके. इसके अलावा उसी नस्ल की गाय को खरीदें जिसके दूध की लोकल स्तर पर डिमांड है.

सेल्फ स्टडी भी है जरूरी
अगर आपके पास पहसे डेरी फार्म का कोई एक्सपीरियंस नहीं है, तो ऐसे में गाय की नस्ल, बियाने, दूध कैसे निकाला जाए और क्या चारा खिलाया जाए, इसके बारे में ठीक से पढ़ लेना चाहिए. साथ ही आप खुद की डेरी खोलने से पहले किसी दूसरी डेरी में काम कर के भी जरूरी बातें सीख सकते हैं| 

पैसा ठीक ढंग से करें इस्तेमाल

डेरी फार्म खोलने के लिए काफी पैसा चाहिए होता है. इसलिए पैसे का ठीक से इस्तेमाल किया जाना बेहद जरूरी है. अगर आप पैसे बचाना चाहते हैं तो इसके लिए खुद का नया डेरी फार्म सेट अप करने से बेहतर है, आप कोई वो फार्म लें, जहां अभी काम जारी हो. यहां थोड़ी बहुत मरम्मत करा के, आपका काम भी चल जाएगा और पैसे भी बचेंगे.

मार्केटिंग और सेल 
डेरी फार्म के खोलने से पहले आप लोकल मार्किट व आसपास के क्षेत्रों में जाकर जानकारी भी प्राप्त करे की कोनसे प्रोडक्ट्स की डिमांड ज्यादा हैं और फिर उसी अनुसार आप गाय की नस्ल लेकर डेरी खोलें | 

कृषि खेती

उत्तराखंड में खेती अब नए कलेवर में नजर आएगी। केंद्र सरकार के मॉडल एक्ट 'कृषि उपज एवं पशुधन संविदा खेती और सेवाएं (प्रोत्साहन एवं सुविधा) अधिनियम' को राज्य में लागू किए जाने के फैसले के बाद राज्य में कांट्रेक्ट फार्मिंग हो सकेगी। एक्ट के तहत संविदा खेती को कानूनी जामा पहनाए जाने से खेती-बागवानी को नए आयाम मिलेंगे। इसके साथ ही बंजर में तब्दील हो चुकी कृषि योग्य भूमि को सामूहिक खेती के लिए लीज पर दिया जा सकेगा। जाहिर है कि इससे किसानों को लाभ तो मिलेगा ही, खेतों में फसलें भी लहलहाएंगी।

उत्तराखंड में खेती की स्थिति 

राज्य में खेती-किसानी की दशा किसी से छिपी नहीं है। सरकारी आंकड़ों पर ही नजर दौड़ाएं तो राज्य गठन के वक्त यहां 7.70 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में खेती होती थी, जो अब घटकर 6.72 लाख हेक्टेयर पर आ गई है। यानी कृषि भूमि में 98 हजार हेक्टेयर की कमी आई है। हालांकि, गैर सरकारी आंकड़े इसे करीब सवा लाख हेक्टेयर के करीब बताते हैं। सबसे अधिक कृषि भूमि पर्वतीय क्षेत्रों में बंजर में तब्दील हुई है। इसके पीछे पलायन, मौसम की बेरुखी, वन्यजीवों का खौफ, सिंचाई साधनों का अभाव जैसे कारण हैं।

खेती को नए आयाम मिलने की उम्मीद जगी 

इस परिदृश्य के बीच अब खेती को नए आयाम मिलने की उम्मीद जगी है। कृषि उपजा एवं पशुधन संविदा खेती और सेवाएं (प्रोत्साहन एवं सुविधा) अधिनियम को अपनाने से यहां भी संविदा खेती को बढ़ावा मिलेगा। यानी, अब अगर खेत और बागान दूसरों को कृषि और बागवानी के लिए दिए जाते हैं तो इसे कानूनी जामा पहनाया जाएगा। बंजर हो चुकी कृषि भूमि को भी लीज पर सामूहिक खेती को दिया जा सकेगा।

फलों की खेती

फलदार वृक्ष और लौकी की छाई हरियाली

यहां कटहल, आम, अमरूद जैसे फलदार वृक्ष और लौकी, तरोई, भिन्डी, बरबट्टी आदि सब्जियों की फसल भी ली जा रही है। यह कमाल कर दिखाया है इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय के कृषि वैज्ञानिकों ने। उन्होंने अपने जोश और जुनून से कामयाबी की नयी इबारत लिख दी है।

ऐसे किया साइंटिस्टों ने प्रयास

कॉलेज के डीन डॉ. एएल राठौर कहते हैं कि यहां न तो सिंचाई सुविधा थी न ही भू-जल पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध था। वहां खोदे गये बोरवेल में सिर्फ डेढ़ इंच पानी मिला। सहयोगियों ने इसे एक चुनौती के रूप में स्वीकार किया। पिछले वर्ष यहां ड्रिप इरिगेशन के साथ चार एकड़ क्षेत्र में एप्पल बेर, डेढ़ एकड़ में अनार, दो एकड़ में आम, एक एकड़ में अमरूद और आधा एकड़ क्षेत्र में कटहल जैसे फलदार पौधों की उन्नत किस्मों का रोपण किया। इसके साथ ही उन्होंने अंतरवर्ती फसलों के रूप में लौकी, तरोई, भिन्डी, बरबट्टी, ग्वारफली आदि सब्जियों की फसल भी ली। खमार और बांस के पौेधे लगाये गये। अब इन पौधों में फल आने लगे हैं।

मसाला खेती

नौकरी के लिए गांव छोड़कर शहरों की ओर पलायन करना, और उच्च शिक्षा के बावजूद अपनी जड़ों से ही जुड़े रहकर अपने अलावा कई एक और लोगों को भी किसी रोजी-रोजगार से जोड़ लेना, ये सफलता-असफलता की दो अलग-अलग स्थितियां हमेशा से रही हैं। पढ़-लिखकर भी रोजी के लिए शहर-शहर भटकने वाले लाखों युवाओं में बड़ी संख्या उनकी है, जिन्होंने अपने असफल भविष्य का रास्ता उनका खुद का बनाया हुआ है। भैये, एजुकेशन के समय चौबीसो घंटे मोबाइल पर डांस करोगे, फेसबुक पर तैरते रहोगे, हाय-हलो में वक्त बिता दोगे तो तुम्हारे एमए, बीए के जाली सर्टिफिकेट देखकर अपना धंधा चौपट कराने के लिए रोजगार कौन देगा? मां-बाप तो सारे नखरे झेल लिए, निवेशक क्यों बर्दाश्त करे! अपने विवेक, मेहनत और साहस से आज भी तमाम युवा ऐसे हैं, जो अच्छी खासी लाखों के पैकेज वाली नौकरियां छोड़कर बालू में तेल निकाल रहे हैं, अपने हुनर और सफलता से जमाने को चमत्कृत कर रहे हैं और एजुकेशन के समय 'लोलक-लैया' करते रहे यूथ को झाड़ूपोंछा का भी जॉब नहीं मिल पा रहा है। देखिए कि गांवों में प्रतिभाशाली कामयाबी के कैसे झंडे फहराते जा रहे हैं।

मशरूम की खेती

मशरूम की खेती किसानों के लिए अब फायदे का सौदा बन रही है। इसके प्रति किसानों का रुझान लगातार बढ़ता जा रहा है। करीब पांच साल से किसानों में मशरूम की खेती तेजी से लोकप्रिय हुई है। किसानों की कड़ी मेहनत तथा अच्छे भाव मिलने के कारण मशरूम की खेती फायदे का सौदा साबित होने लगी। किसान सीमित संसाधन में मशरूम की खेती कर बढ़िया मुनाफा कमा रहे हैं। कम जगह में अधिक से अधिक फायदा देने वाली यह खेती कई किसानों के आय का जरिया बन रही है। शुरुआत में मशरूम की खेती करने वाले किसानो की आर्थिक स्थिति में आए सुधार को देखते हुए भारी संख्या में किसानों ने इसे अपना लिया। आचार फैक्टरी, सूप के पाउडर, होटलों व विवाह समारोह में सब्जी आदि में इस्तेमाल होने वाली सफेद बटन मशरूम का उत्पादन लगातार बढ़ा है। भुड़िया गाँव में मशरूम की खेती करने वाले जितेंद्र कुमार (38 वर्ष) बताते है, "मशरूम की खेती अति संवेदनशील होती है, काफी हद तक यह मौसम पर निर्भर करता है, अधिक ठंड में इसका उत्पादन ठहर जाता है। अभी उत्पादन की शुरुआत नहीं हुई है यह करीब नवम्बर से शुरू हो सकेगा और अगर हल्की ठंड का मौसम लंबा चला तो उत्पादन और अधिक समय तक मिलता रहेगा।"